जीवित्पुत्रिका व्रत 14 सितंबर को, संतान की लंबी आयु व समृद्धि की कामना में माताएं रखेंगी उपवास
संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जिउतिया व्रत भी कहा जाता है, पूरे आस्था और श्रद्धा के साथ रखा जाता है। इस वर्ष यह व्रत रविवार को होगा जबकि पारण सोमवार की सुबह 6.36 बजे के बाद किया जाएगा। व्रत से एक दिन पहले 13 सितंबर को नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाएगी। मां काली मंदिर के ज्योतिषाचार्य पंडित सच्चिदानंद मिश्र के अनुसार सप्तमी तिथि शनिवार को दिन में 11.14 बजे आरंभ होगी, इसलिए इसी दिन तेल-खली चढ़ाने का विशेष विधान रहेगा। ओठगन का समय अहले सुबह 4.30 बजे तक रहेगा।
इस व्रत का उद्देश्य संतान को हर प्रकार की अनिष्ट शक्तियों और बुरी नजर से सुरक्षित रखना माना जाता है। व्रती महिलाएं इस दिन विशेष पूजा-अर्चना कर अपने बच्चों की दीर्घायु और निरोगी जीवन की कामना करती हैं।
जीमूतवाहन की कथा से जुड़ा व्रत का महत्व
प्राचीन काल में जीमूतवाहन नामक एक परोपकारी और धर्मात्मा राजा हुए। राजपाट त्यागकर वे वन में रहने लगे। एक दिन उन्होंने एक वृद्धा को रोते देखा। पूछने पर वृद्धा ने बताया कि वह नागवंश से है और गरुड़ प्रतिदिन एक नाग को भक्ष्य बनाता है, आज उसके पुत्र की बारी है। यह सुनकर जीमूतवाहन ने दया व साहस दिखाते हुए कहा कि वह उसके पुत्र के स्थान पर स्वयं गरुड़ के सामने जाएंगे। अगले दिन वे नाग का वेश धारण कर शिला पर लेट गए। जब गरुड़ उन्हें ले जाने लगा, तो उन्होंने सत्य बताया कि वे मनुष्य हैं। उनके इस त्याग और करुणा से नागवंश की रक्षा हुई।
इसी कथा की स्मृति में जीवित्पुत्रिका व्रत का विधान है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से नागदोष दूर होता है और संतान सुरक्षित व स्वस्थ रहती है। ज्योतिषाचार्य पंडित मिश्र ने लोगों से आह्वान किया है कि वे व्रत की परंपराओं और विधि का पालन कर संतान की दीर्घायु के लिए प्रार्थना करें।

